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इतिहास

परिकल्पना

“यह हम जैसे व्यक्तियों का दायित्व है कि हम अपने देश में रहें व अनुसंधान के वैसे उत्कृष्ट स्कूलों का निर्माण करें जैसे कुछ अन्य देशों में हैं”।इस परिकल्पना से टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान का जन्म हुआ जिसकी स्थापना होमी भाभा ने की। संस्थान की स्थापना 01 जून, 1945 को सर दोराबजी टाटा न्यास की सहायता से की गई। संस्थान ने सर्वप्रथम भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू के कैंपस में ब्रह्मांड किरण अनुसंधान इकाई में कार्य करना प्रारंभ किया। तत्पश्चात उसी वर्ष संस्थान को अक्टूबर माह में मुंबई में स्थानांतरित किया गया।

केनिलवर्थ से कोलाबा तक

मुंबई में संस्थान को पेडर रोड पर स्थित केनिलवर्थ बंगले पर स्थानांतरित किया गया। इसका उद्घाटन मुंबई के राज्यपाल सर जॉन कोल्विले ने 19 दिसंबर, 1945 को किया। वर्ष 1949 में संस्थान के विकास के साथ इसे गेटवे ऑफ इंडिया के निकट ओल्ड यॉट क्लब बिल्डिंग (रॉयल बाम्बे यॉट क्लब का पूर्व केंद्र) में दूसरा केंद्र प्राप्त हुआ। ब्रह्मांड किरण समूह ऐसा पहला समूह था जिसने संस्थान में कार्य करना प्रारंभ किया। नाभिकीय इमल्शन व इलेक्ट्रॉन चुंबकत्व समूह ने 1953 में कार्य करना प्रारंभ किया। संगणक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में कार्य, 1954 से प्रारंभ हुआ एवं प्रारंभिक मशीन ने 1956 में कार्य करना शुरू किया। पूर्ण रुप से सुसज्जित मशीन जिसका बाद में नामकरण TIFRAC किया गया, ने फरवरी, 1960 में कार्य करना प्रारंभ किया। कोलाबा में मुख्य इमारत की आधारशिला, पंडित जवाहर लाल नेहरु ने 1954 में रखी। संस्थान का वर्तमान मुख्य परिसर इसी इमारत में है। समुद्रतट पर उद्यानों, लॉन्स व समुद्र किनारे के प्रोमेनेड की डिजायन, शिकागो के वास्तुशास्त्री हेल्मुथ बार्टस् ने तैयार की। इस इमारत का उद्घाटन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने 15 जनवरी, 1962 को किया।

त्रिपक्षीय समझौता

वर्ष 1955-56 में भारत सरकार, मुंबई सरकार व सर दोराबजी टाटा न्यास के मध्य हुआ त्रिपक्षीय समझौता संस्थान में लागू हुआ। इस समझौते के अनुसार भारत सरकार से बड़ी वित्तीय सहायता व इसके अनुरुप प्रबंध परिषद में सरकार के लिए बड़ा व अधिक स्थाई प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। वर्तमान में 99 प्रतिशत से अधिक संस्थान के व्यय का वहन, भारत सरकार द्वारा किया जाता है। संस्थान, परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत आता है एवं इस विभाग से ही सभी अनुदान प्राप्त होते हैं।

संस्थान का विस्तार

1960 के दशक में संस्थान ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार कर आण्विक जैव विज्ञान समूह व रेडियो खगोल विज्ञान समूह प्रारंभ किया। अल्प तापमान सुविधा केंद्र व अर्द्ध चालक समूह ने भी इसी समय अपना कार्य प्रारंभ किया। वर्ष 1964 में मूल दंत अनुसंधान समूह ने कार्य करना प्रारंभ किया जो बाद में बंद हो गया। 1970 के दशक में संस्थान ने अपने कार्य क्षेत्र में सैद्धांतिक खगोल भौतिकी व होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केंद्र को शामिल किया। अगले दो दशकों में संस्थान ने अपने कार्यक्षेत्र को और अधिक विस्तृत रुप देकर नए राष्ट्रीय केंद्रों की स्थापना की। इन केंद्रों में पुणे में “राष्ट्रीय रेडियो खगोलभौतिकी केंद्र”, बेंगलुरू में “अनुप्रयोज्य गणित केंद्र”, बेंगलुरू में “राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र” हैं। नए राष्ट्रीय केंद्रों की स्थापना में नवीनतम “अंतर्राष्ट्रीय सैद्धांतिक विज्ञान केंद्र” है जिसकी स्थापना वर्ष 2007 में हुई थी। संस्थान का कार्य तीन स्कूलों के अंतर्गत किया जाता है : गणित स्कूल, प्राकृतिक विज्ञान स्कूल व प्रौद्योगिकी एवं कंप्यूटर साइंस स्कूल। संस्थान को वर्ष 2003 में मानद विश्वविद्यालय की मान्यता प्रदान की गई।

निदेशक

वर्ष 1966 में संस्थान के स्थापक निदेशक होमी भाभा की मृत्यु, हवाई दुर्घटना में हो गई। उनके पश्चात प्रोफेसर एम.जी.के. मेनन को संस्थान का निदेशक नियुक्त किया गया। प्रोफेसर मेनन के पश्चात प्रोफेसर बी.वी. श्रीकांतन ने वर्ष 1975 में निदेशक के रुप में कार्यभार ग्रहण किया। प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह, वर्ष 1987 में संस्थान के निदेशक बने। प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह के पश्चात वर्ष 1997 में प्रोफेसर एस.एस. झा को निदेशक के रुप में नियुक्त किया गया। प्रोफेसर झा के पश्चात प्रोफेसर एस. भट्टाचार्य, वर्ष 2002 में निदेशक बने। संस्थान के वर्तमान निदेशक प्रोफेसर मुस्तानसिर बार्मा हैं।