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नाव

-दीपक तिवारी

 

दूर बहुत आ गए हम तो,
जाने अब मेरा गाँव कहाँ?
धूप ही धूप बिखर रही है,
उमीदों की अब छांव कहाँ?
ऊँगली पकड़ बड़े हुए जो,
ढूंढते रहे पर वो पाँव कहाँ?
पार ले जाने को, हे मेरे प्रभु,
जाने है मेरी नाव कहाँ ?

दूर तो अभी बहुत जाना तुझे,
पर मन तेरा बसेगा गाँव में!
देख, जग रोशन है धूप से,
अँधेरा भरा है छांव में!
जब सीख लिया है चलना तूने,
उनकी चाल भी है तेरे पाँव में!
पतवार पकड़ साथ मैं,
सवार हूँ तेरे नाव में!

About the Poet:

He is a poet by heart. He loves  painting, photography, gardening, movie-making  and, even cooking, which are nothing but manifestations of his poetry.

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